प्रवासी मजदूर व सरकार
Bihar में प्रवासी मजदूरों की घर वापसी बदस्तु्र जारी है इधर बिहारियों को सरकार यह आश्वासन दे रही है कि उन्हें अपने राज्य में ही रोजगार के अवसर प्रदान किये जायेंगे।मुख्यमंत्री की यह घोषणा सुुुनने में तो बहुुुत अच्छी लगती है पर सवाल यह है कि मुख्यमंत्री की यह घोोषणा कहीं आगामी विधानसभा चुनावो का जुमला तो नही। बिहार के प्रवासियों की पीड़ा सारी दुनियां ने देखी है। बिहार के प्रवासी जिस तरह हजारों किलोमीटर की यात्रा पैदल,रिक्शे,ठेले और साईकल से तय करते हुये अपने घरों तक पहुंच गए ,यह अपने आप में एक मिसाल है।बिहार की एक बेटी जिसने अपने बीमार पिता को साइकिल से घर तक ले आने का दुस्साहस दिखाया वो आज विश्व भर में चर्चा का विषय बनी हुई है। परिस्थितियों में भी बिहारियों ने अपने जज्बे को दिखाया है जो यह साबित करने के लिए काफी है कि बिहारियों के लिये कुछ भी असम्भव नहीं ।अब बारी सरकार की है कि वो बिहारी मजदूरों के रोजगार के लिए ठोस पहल करे यह काम अगर उतना आसान नहीं है तो मुश्किल भी नहीं है।सरकार की यदि इच्छाशक्ति हो तो कुछ भी असम्भव नहीं होता।अगर सरकार वोट बैंक बनाने के लिए मुफ्त में अनाज दे सकती है, स्कूल ड्रेस व साईकल दे सकती है, मिड डे मिल की योजना चला सकती है तो फिर बिहार में रोजगार सृजन हेतु छोटे,मध्यम व लघु उद्यमों का जाल भी बिछाया जा सकता है।प्रधानमंत्री मोदी जी की तरह वोकल फ़ॉर लोकल का नारा यहां भी लागू हो सकता है।हमारी आबादी ज्यादा है तो हमारा बाजार भी बड़ा है और रोजमर्रा की वस्तुओं का हम यहां निर्माण और यहीं खपत की नीति बनाएं तो हमारे आत्मनिर्भर होने का सपना पूरा हो सकता है। मगध,शाहाबाद,सारण, चंपारण में चावल मिल,गन्ना मिल,कोशी क्षेत्र में मकई प्रसंस्करण उद्योग,भागलपुर में चूड़ा, गुड़ व केला प्रसंस्करण, मिथिला में मखान प्रसंस्करण के साथ आधुनिक तकनीक से गहन मत्स्यपालन व फिश फिलेट इकाई,नालंदा में सब्जियों के प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित कर बिहार की बदहाली का स्थायी तौर पर निदान किया जा सकता है।इन सबके अलावा उपभोक्ता सामग्रियों जैसे जूते, चप्पल,जुट के उत्पाद,टॉफ़ी,दालमोट,अन्य खाद्य सामग्रियों की इकाइयां लगाकर लोगों को स्वरोजगार दिया जा सकता है।यह भी सच है कि बिहार के विभिन्न जिलों में सरकारी एजेंसियां गैर सरकारी संगठनों के साथ मिलकर यह काम कर रही हैं पर इसके विस्तार और इसे गति देने की जरूरत है। इस कार्य के लिए केंद्र सरकार से आर्थिक सहायता की मांग की जानी चाहिए,2014 के चुनावों के वक्त जिस पैकेज का वादा प्रधानमंत्री जी ने किया था उसका हिसाब किताब कर और ज्यादा पैकेज मांगी जानी चाहिये।कोरोना बन्दी के उपरांत 20 लाख करोड़ के पैकेज में बिहार की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा हो ऐसी मांग बिहार सरकार द्वारा की जानी चाहिए। साथ ही साथ बिहार की जनता खासकर प्रवासी बिहारी बन्धुओं को संगठित होकर यह आवाज उठाने की जरूरत है।इस लॉक डाउन ने मजदूरों की वैसे ही कमर तोड़ दी है, हम पचास साल पीछे चले गए हैं।जिस सामंती मिजाज,बंधुआ मजदूरी,भूस्वामियों के जिल्लत जलालत से तंग आकर हमने महानगरों का रुख किया वहां हमने अपनी मिहनत से एक मुकाम बनाया वो सब एक झटके में भरभराकर गिर गया।आज फिर हम वापस अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं।ऐसे में अगर सचेत न हुये तो या तो हम पुनः बंधुआ मजदूर की जिंदगी जीने को बाध्य होंगे। फिर हमें उन्हीं महानगरों का रुख करना होगा जिसने हमारे सदियों के मिहनत की कद्र न करते हुये हमें अचानक सड़क पर भागने को मजबूर कर दिया। मैं ऐसे प्रवासी मजदूरों से खासकर जो हुनरमंद हैं उनसे आग्रह करूंगा कि वो अपने अपने प्रखंड जिले में एक नेटवर्क बनाकर सम्भावनाओं की तलाश करें,गांव मुहल्ले के पूंजी वाले लोगों के साथ मिलकर स्टार्टअप बिहार का शुभारंभ करें।
प्रवासी मजदूर व सरकार
Reviewed by
the Jilatop
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June 23, 2020
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