स्वामी सहजानंद सरस्वती


मेरे Blog की पहली कहानी स्वामी 20 वीं सदी के महान सन्यासी,समाज सुधारक व भारत में किसान आंदोलन के जनक श्रद्धेय स्वामी  सरस्वती को समर्पित है।
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मैंने जो जिन विभूतियों की जीवनी पढ़ी है उनमें एक स्वामी जी की जीवनी है और इनके विचारों ने मुझे बहुत प्रभावित किया है।स्वामी जी का नाम मैंने पहली बार शायद 1980 के आसपास सुना था जब एक सम्बंधी के गांव में उनकी जयंती मनाई जा रही थी।एक साधु हैं स्वामी हरि नारायणा नंद वही इस आयोजन के मुख्य अतिथि थे।उसके बाद वो विस्मृत हो गए जब मैं ट्रेड यूनियन आंदोलन में सक्रिय हुआ तो मेरी नजर एक किताब पर पड़ी शीर्षक था मेरा जीवन संघर्ष और लेखक स्वामी सहजानंद सरस्वती।वह किताब मैंने खरीदी और उसे कई बार पढ़ा और पता नहीं क्यों उस एक किताब में लिखी बातों ने मुझे काफी प्रभावित किया।।
प्रारंभिक अवस्था
स्वामी सहजानंद का जन्म 1899 में महाशिवरात्रि के दिन उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के देवा गांव में हुआ था।उनके पूर्वज पंजाब मूल के जुझौतिया ब्राह्मण थे जो देवा ग्राम में आकर बस गए जहां स्थानीय भूमिहार ब्राह्मणों से रक्त सम्बंध स्थापित होने के कारण भूमिहार ब्राह्मण कहलाये जाने लगे।
आरम्भिक शिक्षा पास के मदरसे में हुई और मात्र तीन वर्षों में ही उन्होंने 6ठी कक्षा उतीर्ण कर ली।वैराग्य का भाव उनमें बचपन से ही था इसलिये उनकी शादी जल्द ही कर दी गई पर अल्प अंतराल में ही उनके पत्नी की मृत्यु हो गई।अपने पुनर्विवाह की तैयारी होती देख उन्होंने गृहत्याग कर दिया और काशी आकर  से सन्यास की दीक्षा ले ली।इनके सन्यास को लेकर भी विवाद उत्पन्न होने लगा कि एक गैर ब्राह्मण दंडी सन्यासी नहीं हो सकता तो इन्होंने शास्त्रार्थ की चुनौती दी और उसमें इन्होंने अपने ज्ञान,तर्क व ओजस्वी वाणी से विरोधियों को न सिर्फ पराजित किया।उन्होंने यह साबित किया कि युद्ध की स्थितियों में शस्त्र व शांति काल में जीविकोपार्जन के लिये कृषि व हल धारण करने वाले बाभन या भूमिहार भी  ब्राह्मण ही हैं।इसके उपरांत इन्होंने भूमिहारों की प्रतिष्ठा कायम करने के लिये समाज सुधार आंदोलन चलाया।
स्वामी जी के कार्यों व रचनाओं को पढ़ने से बहुत ऊर्जा व प्रेरणा मिलती है एक छठी क्लास पास सन्यासी की हर रचना में दम है।तर्क व दर्शन का समिश्रण है,एक सन्यासी का काम सिर्फ कन्दराओं व गुफा में बैठकर तपस्या करना ही नहीं है बल्कि अपने ज्ञान,ओज व ऊर्जा को समाज की बेहतरी के लिये इस्तेमाल करना है।स्वामी जी का जीवन इस कसौटी पर सौ फीसदी खड़ा उतरता है।एक सन्यासी का बरास्ते समाज सुधार आंदोलन,राजनीति व किसान आंदोलन में प्रवेश,फिर मार्क्सवाद को आत्मसात कर लेना एक क्रांतिकारी बदलाव का सजीव उदाहरण है।आज जिस सामाजिक न्याय,किसानों की पीड़ा,दलित उत्पीड़न के नाम पर सत्ता हड़पने की और मालामाल होने की राजनीति चल रही है उसके सूत्रपात का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है।भूमिहार ब्राह्मण महासभा की स्थापना से शुरू हुई उनकी यात्रा देश के पहले संघटित किसान संगठन अखिल भारतीय किसान सभा के गठन तक पहुंचती है।इस दौरान उनकी गांधी जी से मुलाकात व गांधी द्वारा कांग्रेस में शामिल होने का आग्रह स्वीकार करना उनके जीवन व सोच की विविधता व खुलेपन को प्रदर्शित करता है।उनकी जीवनी लिखने वालों ने उन्हें एक ठेठ राष्ट्रवादी व  मार्क्सवादी बताया है।
वो एक जिज्ञासु थे जिस वजह से उनके कार्य व विचार समय काल के अनुसार बदलते रहे।स्वभाव से वो सन्यासी व विद्रोही बने रहे,अपनी ही द्वारा बनाई गई भूमिहार ब्राह्मण महासभा को भंग किया,खटपट हुई तो कांग्रेस छोड़ दिया और जीवन पर्यंत किसानों के हित के लिये लड़ते रहे।
जो अन्न उपजायेगा अब शासन वही चलाएगा
जैसे नारे स्वामी जी के वर्गीय समझ को रेखांकित करते हैं तो टैक्स हमारा नहीं लगेगा लठ्ठ हमारी जिंदाबाद उनके विद्रोही व क्रांतिकारी सोच को स्थापित करते हैं।
जानकर बताते हैं कि वो बिल्कुल अखखड़,बेलाग व बेबाक थे,उत्पीड़न व अन्याय के खिलाफ परशुराम व दुर्वासा का रूप धारण कर लेते।अजीब मस्त मौला व्यक्तित्व वाणी में बिल्कुल आग थी तो क्रिया से क्रांतिकारी धुन के पक्के जो ठान लिया सो पूरा किया,चापलूसी से बिल्कुल दूर रहे।
उनके इस स्वभाव की वजह से भूमिहारों के समृद्ध व कुलीन तबकों के पैरोकार माने जाने वाले कई बड़े कांग्रेस नेताओं से उनकी कभी नहीं पटी,जबकि राहुल सांकृत्यायन, इंदुलाल याग्निक,यदु नंदन शर्मा आदि उनकी बहुत इज्जत व समर्थन करते थे।नेताजी सुभाष चंद्र बोस व योगेंद्र शुक्ल जैसे राष्ट्रवादी क्रांतिकारी तो इनके दीवाने थे।
उसवक्त के अनेकों कवि व लेखकों के ये चहेते पात्र थे व स्वामी जी हमेशा रामवृक्ष बेनीपुरी,राष्ट्रकवि दिनकर,फणीश्वरनाथ रेणु,अज्ञेय,बाबा नागार्जुन की रचनाओं के केंद्र में रहे।



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